मोक्षदा एकादशी की व्रत कथा

Devendra Kumar
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मोक्षदा एकादशी व्रत

मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है। इस व्रत से पाप नाश होता है और पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त होता है। आइए इसकी पौराणिक कथा पढ़ते हैं।

मोक्षदा एकादशी की व्रत कथा

📖 मोक्षदा एकादशी व्रत कथा

प्राचीन समय में चम्पकवन नामक एक नगर था जहाँ वैकुण्ठराज नाम के अत्यंत धर्मात्मा राजा शासन करते थे। राजा अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखते थे और रोज़ नियमपूर्वक ब्राह्मणों और साधुओं की सेवा करते थे।

एक दिन राजा ने रात में एक भयानक और दुखदायक स्वप्न देखा। उन्होंने देखा कि उनके पिता नर्क में कष्ट झेल रहे हैं और अत्यंत दु:खी अवस्था में रो रहे हैं।

सुबह होते ही राजा बहुत चिंतित हो गए। उन्होंने तुरंत नगर के विद्वानों और ब्राह्मणों को बुलाकर अपने स्वप्न के बारे में बताया। विद्वानों ने सलाह दी—

“राजन! इस रहस्य का समाधान केवल महर्षि पर्वत के पास मिलेगा, जो हिमालय पर तपस्या कर रहे हैं।”

राजा तुरंत हिमालय की यात्रा पर निकल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने विनम्रता से महर्षि पर्वत को प्रणाम किया और अपने पिता के दुःख का कारण पूछा।

महर्षि ने ध्यान लगाकर दिव्य दृष्टि से सब देखा और बोले—

“राजन! आपके पिता ने पूर्व जन्म में कुछ छोटे-छोटे पापकर्म किए थे, जिनके कारण वे नर्क में कष्ट पा रहे हैं। यदि आप अपने पिता को मुक्ति दिलाना चाहते हैं तो मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, जिसे मोक्षदा एकादशी कहा जाता है, का व्रत कीजिए और उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित कर दीजिए।”

राजा ने अत्यंत श्रद्धा से मोक्षदा एकादशी का व्रत किया और द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को दान दिया। फिर पूरे व्रत का पुण्य अपने पिता के नाम समर्पित कर दिया।

व्रत के प्रभाव से राजा के पिता तुरंत नर्क से मुक्त होकर स्वर्ग लोक को प्राप्त हो गए।

तब देवदूतों ने राजा से कहा—

“हे राजन! मोक्षदा एकादशी का यह व्रत केवल पूर्वज ही नहीं, किसी भी आत्मा को मोक्ष देने में सक्षम है।”

इस प्रकार मोक्षदा एकादशी व्रत से सभी पाप नष्ट होते हैं और आत्मा को परम शांति मिलती है।

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🌺 मोक्षदा एकादशी का महत्व

  • पापों का नाश
  • पूर्वजों को मोक्ष
  • परिवार में शांति
  • मन में पवित्रता
  • भगवान विष्णु की विशेष कृपा

🙏 व्रत विधि (संक्षेप में)

  • प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प
  • भगवान विष्णु, विशेषकर श्रीकृष्ण की पूजा
  • तुलसी पत्र चढ़ाना
  • दिनभर उपवास
  • कथा श्रवण
  • रात्रि जागरण
  • द्वादशी को दान-पुण्य
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