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Reading: Big Alert ! क्या ₹100 के पार जाएगा भारतीय रुपया ? Major Economic Crisis Ahead
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DevPathshala > Blog > Banking > Big Alert ! क्या ₹100 के पार जाएगा भारतीय रुपया ? Major Economic Crisis Ahead
Banking

Big Alert ! क्या ₹100 के पार जाएगा भारतीय रुपया ? Major Economic Crisis Ahead

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Last updated: 08.06.2026 6:10 PM
Devendra Kumar
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₹100 के पार जाएगा भारतीय रुपया
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 Big Alert: ₹100 के पार जाएगा भारतीय रुपया
Image: AI

क्या ₹100 के पार जाएगा भारतीय रुपया

ग्लोबल करेंसी मार्केट में इस वक्त जबरदस्त उथल-पुथल मची है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही आर्थिक खींचतान ने भारतीय नीति-निर्माताओं, निवेशकों और आम जनता की चिंताएं बढ़ा दी हैं। कई बड़े वैश्विक असेट मैनेजमेंट फंड्स अब खुलकर चेतावनी देने लगे हैं कि भारतीय रुपया (INR) अमेरिकी डॉलर के मुकाबले जल्द ही ऐतिहासिक 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर को छू सकता है। एबरडीन इन्वेस्टमेंट्स, मेटलाइफ इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट और गामा एसेट मैनेजमेंट जैसे अंतरराष्ट्रीय दिग्गजों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां रुपए पर दबाव लगातार बढ़ा रही हैं।

Contents
  • क्या ₹100 के पार जाएगा भारतीय रुपया
  • रुपया गिरने के 5 बड़े और निर्णायक कारण
  • लाइव मार्केट का सच : अभी कहां खड़ा है रुपया ?
  • Reserve Bank’s Defense Mechanism : गिरावट रोकने की रणनीति
  • डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरावट का गणित
  • क्या वाकई रुपया 100 का स्तर पार करेगा ?
  • FAQ : रुपए की गिरावट और ₹100 के खतरे से जुड़े आम सवाल

यह डर केवल हवा-हवाई नहीं है। अगर हम इस साल के आंकड़ों पर नजर डालें, तो भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर की तुलना में 7% से अधिक टूट चुका है। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि 1-वर्षीय फॉरवर्ड मार्केट (जहां भविष्य की अनुमानित कीमतों पर करेंसी के सौदे होते हैं) में रुपया पहले ही 100 का आंकड़ा पार कर चुका है।

हालांकि, हाजिर बाजार (स्पॉट मार्केट) में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पूरी ताकत से मोर्चा संभाले हुए है। इस विस्तृत लेख में हम समझेंगे कि रुपए की इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे कौन से बड़े वैश्विक और घरेलू कारक काम कर रहे हैं, इसके आंकड़े क्या हैं, और इससे आपकी जेब पर क्या असर होने वाला है।

रुपया गिरने के 5 बड़े और निर्णायक कारण

अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब भी उथल-पुथल होती है, उसका सीधा असर उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी पर पड़ता है। भारतीय रुपया भी इस समय वैश्विक व्यापक आर्थिक (Macroeconomic) और भू-राजनीतिक (Geopolitical) बदलावों की मार झेल रहा है। रुपए में आ रही इस तेज गिरावट के मुख्य रूप से 5 बड़े कारण हैं:

1. कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतें और भू-राजनीति

भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 85% से 90% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। मध्य पूर्व में, विशेषकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य और कूटनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह बाधित हुई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे संवेदनशील समुद्री रास्तों पर बढ़ते संकट की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 100 से 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं।

भारत को इस महंगे तेल को खरीदने के लिए बहुत भारी मात्रा में डॉलर का भुगतान करना पड़ रहा है। तेल का यह बढ़ा हुआ बिल देश के चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को तेजी से बढ़ा रहा है, जिससे रुपए की वैल्यू लगातार गिर रही है।

2. विदेशी संस्थागत निवेशकों (FPIs) का भारी पलायन

वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता का माहौल होने पर अंतरराष्ट्रीय निवेशक उभरते बाजारों (जैसे भारत, ब्राजील या दक्षिण अफ्रीका) से अपना पैसा निकालना शुरू कर देते हैं। वे इस पैसे को सुरक्षित निवेश के तौर पर अमेरिकी ट्रेजरी बांड्स और डॉलर में लगाते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, अकेले इस साल विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर और डेट मार्केट से 23 अरब डॉलर से अधिक की शुद्ध बिकवाली की है। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से इतनी बड़ी मात्रा में अपनी पूंजी समेटकर बाहर ले जाते हैं, तो वे रुपए को डॉलर में बदलते हैं। बाजार में डॉलर की इस अचानक बढ़ी मांग के कारण रुपए की कीमत तेजी से नीचे गिरती है।

3. मजबूत अमेरिकी डॉलर और फेडरल रिजर्व का रुख

दुनिया भर की करेंसी की सेहत काफी हद तक अमेरिकी केंद्रीय बैंक ‘फेडरल रिजर्व’ की मौद्रिक नीतियों पर निर्भर करती है। पहले यह उम्मीद जताई जा रही थी कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व इस साल अपनी ब्याज दरों में कटौती करेगा। लेकिन अमेरिका में घरेलू महंगाई दर उम्मीद के मुताबिक नीचे नहीं आ रही है। इस वजह से फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को उच्च स्तर पर ही बनाए रखा है। वर्तमान में अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड 4.60% के आसपास बनी हुई है। ब्याज दरें ऊंची होने के कारण दुनिया भर के निवेशक डॉलर की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, जिससे वैश्विक डॉलर इंडेक्स लगातार मजबूत हो रहा है और रुपया कमजोर पड़ रहा है।

4. रिकॉर्ड स्तर पर सोने का आयात

कच्चे तेल के बाद सोना दूसरा ऐसा बड़ा कमोडिटी आइटम है जिसके आयात के लिए भारत को सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। भारत में शादियों के सीजन और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं के कारण सोने की मांग हमेशा ऊंची रहती है। घरेलू बाजार में सोने के इस भारी आयात की वजह से देश का कीमती डॉलर रिजर्व बाहर जा रहा था। इस स्थिति को नियंत्रित करने और रुपए पर दबाव कम करने के लिए सरकार ने हाल ही में सोने और चांदी पर मिलने वाली इम्पोर्ट ड्यूटी (आयात शुल्क) में बढ़ोतरी की है, ताकि गैर-जरूरी आयात को हतोत्साहित किया जा सके।

5. वैश्विक व्यापार युद्ध और निर्यात में सुस्ती

दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं (जैसे चीन, यूरोप और अमेरिका) में इस समय आर्थिक सुस्ती का माहौल है। इसके अलावा कई देशों के बीच चल रहे छिपे हुए व्यापार युद्ध (Trade Tariffs) के कारण वैश्विक व्यापार की रफ्तार धीमी हुई है। इसका सीधा असर भारत के कपड़ा, रत्न-आभूषण और इंजीनियरिंग सामानों के निर्यात पर पड़ा है। जब हमारा निर्यात घटता है, तो देश के भीतर आने वाले डॉलर्स की मात्रा कम हो जाती है। डॉलर की आवक कम होने और उसकी मांग अधिक होने से करेंसी का संतुलन बिगड़ जाता है।

लाइव मार्केट का सच : अभी कहां खड़ा है रुपया ?

भले ही मीडिया और विदेशी ब्रोकरेज फर्म्स में 100 के आंकड़े को लेकर भारी पैनिक और हाइप बनाया जा रहा हो, लेकिन जमीनी स्तर पर लाइव मार्केट के आंकड़े कुछ अलग कहानी बयां करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपने विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करके रुपए को एक निश्चित दायरे से बाहर गिरने से रोकने के लिए लगातार हस्तक्षेप कर रहा है।

यह भी पढ़ें : Hidden Bank Charges : कैसे बैंक चुपचाप आपके पैसे काट रहे हैं ? जानें पूरा सच

नीचे दिए गए टेबल से आप वर्तमान लाइव मार्केट की सटीक स्थिति को समझ सकते हैं :

फॉरेक्स मार्केट पैमानावर्तमान लाइव वैल्यूबाजार का संदर्भ और ऐतिहासिक डेटा
सर्वकालिक निचला स्तर (All-Time Low)97.15मई के मध्य में वैश्विक दबाव के चलते रुपए ने इतिहास के इस सबसे निचले स्तर को छुआ था।
मौजूदा हाजिर दर (Current Spot Rate)95.7322 मई के मार्केट क्लोजिंग आंकड़ों के अनुसार, रुपए ने निचले स्तर से 63 पैसे की शानदार रिकवरी दर्ज की है।
विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves)698 अरब डॉलरकेंद्रीय बैंक ने रुपए को पैनिक फॉल से बचाने के लिए अपने संचित रिजर्व से करीब 30 अरब डॉलर बाजार में छोड़े हैं।
1-वर्षीय फॉरवर्ड मार्केट (1-Year Forward)100 के पारफॉरवर्ड प्रीमियम और भविष्य के हेजिंग सौदों में ट्रेडर्स इस मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर चुके हैं।

Reserve Bank’s Defense Mechanism : गिरावट रोकने की रणनीति

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा की अगुवाई में केंद्रीय बैंक रुपए को किसी भी तरह की सट्टेबाजी या अचानक होने वाली बड़ी गिरावट से बचाने के लिए बहुआयामी रणनीति पर काम कर रहा है। आरबीआई के पास इस समय दुनिया के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडारों में से एक है, जिसका इस्तेमाल वह बहुत सोच-समझकर कर रहा है।

आरबीआई के मुख्य कदम इस प्रकार हैं :

स्पॉट मार्केट में डॉलर की आक्रामक आपूर्ति

जब भी फॉरेक्स मार्केट में विदेशी फंड्स अचानक डॉलर की भारी खरीदारी शुरू करते हैं, तो डॉलर की किल्लत होने लगती है। ऐसे में आरबीआई देश के सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के जरिए सीधे स्पॉट मार्केट में उतरता है और बड़े पैमाने पर डॉलर की बिक्री शुरू कर देता है। बाजार में डॉलर की लिक्विडिटी बढ़ते ही रुपए की गिरावट थम जाती है। पिछले कुछ हफ्तों में आरबीआई ने इसी तरीके से रुपए को 97 के पार जाने से रोका है।

अनशेड्यूल्ड रेपो रेट हाइक पर विचार

आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (MPC) वर्तमान में 5.25% की बेंचमार्क रेपो रेट पर काम कर रही है। विदेशी पूंजी को भारत में रोके रखने और रुपए को मजबूती देने के लिए केंद्रीय बैंक एक अनशेड्यूल्ड (आपातकालीन) ब्याज दर बढ़ोतरी पर भी विचार कर रहा है। हालांकि, केंद्रीय बैंक के भीतर इस बात को लेकर गहरा मंथन चल रहा है कि अगर ब्याज दरें बढ़ाई गईं, तो घरेलू उद्योगों के लिए कर्ज महंगा हो जाएगा, जिससे देश की आर्थिक विकास दर (GDP Growth) प्रभावित हो सकती है।

5 अरब डॉलर की लिक्विडिटी स्वैप नीलामी

मार्केट सेंटिमेंट को स्थिर रखने और बैंकों के पास डॉलर की तात्कालिक कमी को दूर करने के लिए आरबीआई ने 5 अरब डॉलर की डॉलर-रुपया स्वैप नीलामी (Dollar-Rupee Swap Auction) का आधिकारिक एलान किया है। इस प्रक्रिया के तहत केंद्रीय बैंक बैंकों से रुपया लेकर उन्हें डॉलर की तरलता प्रदान करता है, जिससे शॉर्ट-टर्म फॉरवर्ड मार्केट में रुपए पर बना दबाव तुरंत कम हो जाता है।

एनआरआई (NRI) डिपॉजिट्स के लिए आकर्षक योजनाएं

विदेशी मुद्रा भंडार को नए सिरे से भरने के लिए भारत सरकार और आरबीआई मिलकर नॉन-रेसिडेंट इंडियन्स (NRIs) के लिए विशेष फॉरेक्स डिपॉजिट स्कीम्स और बांड्स लॉन्च करने की तैयारी कर रहे हैं। इन स्कीम्स पर विदेशी बैंकों की तुलना में अधिक ब्याज दर की पेशकश की जाएगी। अधिकारियों का अनुमान है कि इस कदम से भारतीय बैंकिंग सिस्टम में सीधे तौर पर लगभग 50 अरब डॉलर की नई विदेशी पूंजी आ सकती है।

डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरावट का गणित

करेंसी मार्केट का यह उतार-चढ़ाव आम इंसान को थोड़ा जटिल लग सकता है। इसे सरल शब्दों में ऐसे समझिए: जब आप कोई सामान विदेश से मंगाते हैं, तो उसका भुगतान रुपए में नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय करेंसी यानी अमेरिकी डॉलर में करना होता है।

मान लीजिए पहले 1 डॉलर की कीमत ₹85 थी। तब भारत के किसी आयातक को विदेश से 100 डॉलर का सामान मंगाने के लिए ₹8,500 देने पड़ते थे। लेकिन जब रुपया गिरकर ₹95.73 या ₹97 हो जाता है, तो उसी 100 डॉलर के सामान के लिए अब ₹9,573 या ₹9,700 चुकाने होंगे। यानी सामान वही है, लेकिन हमारी करेंसी की क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम होने की वजह से हमें उसके लिए ज्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं। यही अतिरिक्त लागत अंततः देश के भीतर महंगाई का रूप ले लेती है।

यह भी पढ़ें : EPFO 3.0 – 7 करोड़ कर्मचारियों को बड़ी राहत: इस महीने से ATM और UPI से निकलेगा PF का पैसा

क्या वाकई रुपया 100 का स्तर पार करेगा ?

ग्लोबल मैक्रो फंड्स भले ही भारतीय रुपए के 100 के पार जाने की भविष्यवाणियां करके बाजार में सनसनी फैला रहे हों, लेकिन घरेलू और संस्थागत विश्लेषकों का नजरिया इतना निराशाजनक नहीं है।

  • Kotak Manhindra Bank की रिपोर्ट: कोटक महिंद्रा बैंक के मुद्रा विश्लेषकों के अनुसार, वैश्विक चुनौतियां गंभीर हैं लेकिन आरबीआई का सुरक्षा चक्र बहुत मजबूत है। बैंक ने रुपए के लिए अपना नया अनुमानित दायरा 93 से 99 के बीच तय किया है। उनके मुताबिक, जब तक क्रूड ऑयल 115 डॉलर के पार नहीं जाता, तब तक हाजिर बाजार में रुपया 100 के स्तर को पार नहीं करेगा।
  • एमंडी इन्वेस्टमेंट इंस्टीट्यूट (Amundi) का विश्लेषण: एमंडी के रणनीतिकारों का कहना है कि मौजूदा वैश्विक पैनिक के कारण भारतीय फाइनेंशियल असेट्स (शेयर और बांड्स) अपनी वास्तविक वैल्यू से काफी नीचे (Undervalued) आ चुके हैं। भारत की आंतरिक आर्थिक बुनियाद (GDP ग्रोथ रेट और टैक्स कलेक्शन) अभी भी मजबूत है। ऐसे में जैसे ही कच्चे तेल की कीमतें थोड़ी भी शांत होंगी, विदेशी निवेशक दोबारा भारतीय बाजार में लौटेंगे और रुपए में एक बहुत तेज और मजबूत रिकवरी देखने को मिलेगी।

FAQ : रुपए की गिरावट और ₹100 के खतरे से जुड़े आम सवाल

प्र: यदि भारतीय रुपया 100 के आंकड़े को पार कर जाता है, तो मेरे बजट पर क्या असर होगा ?

उ: रुपया 100 के पार जाने से सबसे पहला असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ेगा, क्योंकि हमारा तेल आयात महंगा हो जाएगा। माल ढुलाई महंगी होने से खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के हर सामान के दाम बढ़ जाएंगे। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्टफोन, लैपटॉप और आयातित गाड़ियां काफी महंगी हो जाएंगी। अगर आपका बच्चा विदेश में पढ़ाई कर रहा है या आप विदेश यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो आपका खर्च 10% से 15% तक बढ़ सकता है।

प्र: क्या भारतीय रिजर्व बैंक के पास रुपए को पूरी तरह गिरने से बचाने की क्षमता है ?

उ: हां, आरबीआई के पास वर्तमान में 698 अरब डॉलर का एक बेहद विशाल विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है। यह रिजर्व बैंक को किसी भी प्रकार के सट्टेबाज़ी के हमलों और अचानक आने वाले पैनिक से निपटने की पूरी आजादी देता है। आरबीआई बाजार में डॉलर की भारी सप्लाई करके रुपए की गिरावट की रफ्तार को नियंत्रित कर सकता है, हालांकि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को सीधे बदलना किसी भी देश के केंद्रीय बैंक के नियंत्रण में नहीं होता।

प्र: रुपया कमजोर होने से भारतीय शेयर बाजार पर क्या असर पड़ता है ?

उ: रुपए की गिरावट और शेयर बाजार का सीधा संबंध विदेशी निवेशकों (FPIs) से है। जब रुपया तेजी से गिरता है, तो विदेशी निवेशकों को डॉलर के टर्म में घाटा होने लगता है, इसलिए वे भारतीय शेयरों को बेचकर अपना पैसा निकालने लगते हैं। इस भारी बिकवाली के कारण शेयर बाजार में बड़ी गिरावट देखने को मिलती है, विशेषकर बैंकिंग, ऑटोमोबाइल और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर के शेयरों पर इसका सबसे ज्यादा नकारात्मक असर पड़ता है। हालांकि, आईटी (IT) और फार्मा जैसी निर्यात-आधारित कंपनियों को इससे फायदा भी होता है क्योंकि उनकी कमाई डॉलर में होती है।

प्र: क्या आम नागरिकों के लिए इस समय मुनाफा कमाने के लिए डॉलर खरीदकर रखना सही है ?

उ: रिटेल या आम निवेशकों के लिए विदेशी मुद्रा की होर्डिंग या फॉरेक्स ट्रेडिंग करना बहुत जोखिम भरा हो सकता है। रुपया इस वक्त अपने ऐतिहासिक निचले स्तर के बेहद करीब है और आरबीआई के किसी भी बड़े नीतिगत फैसले या लिक्विडिटी सपोर्ट से रुपए में अचानक 2-3% की बड़ी रिकवरी आ सकती है। ऐसी स्थिति में ऊंचे दामों पर डॉलर खरीदने वाले आम निवेशकों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। बिना किसी सर्टिफाइड वित्तीय सलाहकार की अनुमति के करेंसी स्पेकुलेशन से बचना चाहिए।

प्र: रुपए की इस कमजोरी से भारतीय अर्थव्यवस्था के किन सेक्टर्स को फायदा हो सकता है ?

उ: रुपए के कमजोर होने से उन सभी क्षेत्रों को सीधा फायदा होता है जिनकी कमाई का बड़ा हिस्सा विदेशों में निर्यात से आता है। भारत का इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) सेक्टर, सॉफ्टवेयर एक्सपोर्टर्स, फार्मास्युटिकल (दवा) कंपनियां, कपड़ा उद्योग और हस्तशिल्प निर्यातक इस स्थिति में फायदे में रहते हैं। उन्हें विदेशों से मिलने वाले हर डॉलर के बदले अब अधिक रुपए मिलते हैं, जिससे उनका प्रॉफिट मार्जिन काफी हद तक बढ़ जाता है।

Disclaimer: यह Blog research-based analysis पर आधारित है और केवल informational purpose के लिए है।

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